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अजंता विश्वास की राह पर हैं पूर्व छात्र नेत्री

प्रतीक-उर प्रकरण के बीच दीप्शिता के राजनीतिक भविष्य पर अटकलें

19 Feb 2026

अजंता विश्वास की राह पर हैं पूर्व छात्र नेत्री

कोलकाता। आगामी विधानसभा चुनाव से पहले माकपा के भीतर अंतर्कलह और असंतोष के स्वर तेज होने लगे हैं। युवा नेता प्रतीक-उर रहमान द्वारा पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देने के बाद अब एक और प्रखर युवा चेहरा, दीप्शिता धर के राजनीतिक भविष्य को लेकर कयासों का बाजार गर्म है। चर्चा का मुख्य कारण फरवरी का दो तिहाई महीना बीत जाने के बाद भी दीप्शिता द्वारा पार्टी सदस्यता का नवीनीकरण न कराया जाना है। 
सीपीएम के संगठनात्मक ढांचे में सदस्यता नवीनीकरण की प्रक्रिया प्रतिवर्ष 1 जनवरी से शुरू होकर 31 मार्च तक चलती है, लेकिन पार्टी केंद्र से जुड़े सक्रिय सदस्यों का नवीनीकरण आमतौर पर फरवरी के पहले सप्ताह तक पूर्ण हो जाता है। दीप्शिता की सदस्यता फिलहाल दिल्ली यूनिट में दर्ज है, जहाँ से अब तक नवीनीकरण की कोई सूचना न आने पर अलीमुद्दीन स्ट्रीट में बेचैनी बढ़ गई है। राजनीतिक हलकों में इस घटनाक्रम की तुलना दिवंगत माकपा नेता अनिल विश्वास की पुत्री अजंता विश्वास से की जा रही है। 
ज्ञात हो कि कुछ वर्ष पूर्व अजंता विश्वास ने भी इसी तरह सदस्यता का नवीनीकरण नहीं कराया था और अंतत: पार्टी से नाता तोड़ लिया था। हालांकि, दीप्शिता धर ने इन अटकलों पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहा है कि उनके पास अभी 31 मार्च तक का समय है। उन्होंने इस बात पर भी हैरानी जताई कि पार्टी का यह आंतरिक और व्यक्तिगत मामला मीडिया तक कैसे पहुंचा। लेकिन उनके बयान में कहीं भी यह स्पष्ट आश्वासन नहीं दिखा कि वे निश्चित रूप से सदस्यता का नवीनीकरण कराएंगी, जिससे संशय की स्थिति और गहरा गई है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, दीप्शिता धर पिछले कुछ समय से सांगठनिक स्तर पर स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रही हैं। विशेष रूप से उत्तरपाड़ा विधानसभा सीट से उनकी उम्मीदवारी को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच, हाल के दिनों में पार्टी द्वारा मिनाक्षी मुखर्जी को उस क्षेत्र में अधिक सक्रिय किए जाने से समीकरण बदलते दिख रहे हैं। लोकसभा चुनाव में श्रीरामपुर सीट से प्रभावी प्रदर्शन करने के बावजूद, सांगठनिक जिम्मेदारियों में आए बदलावों ने उन्हें असहज कर दिया है। इसके साथ ही, उनके करीबी सहयोगी प्रतीक-उर रहमान के इस्तीफे ने उनके लिए वेट एंड वॉच  की स्थिति पैदा कर दी है। अब सभी की नजरें 31 मार्च की समयसीमा पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि दीप्शिता वामपंथी खेमे में बनी रहेंगी या बंगाल की राजनीति में कोई नया अध्याय शुरू करेंगी।

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